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About This Blog
This blog contains poems written by me on different topics and with different essence everytime, along with photographs shot by me during various trips in India and UK containing macros, sceneries, urban and rural shots, I hope this blog will serve you with a range of variety and you will enjoy my work.
कुछ बीती हुई यादें हैं
कैसे मैं जला दूँ ?
कुछ टूटे हुए वादे हैं
कैसे मैं निभा दूँ ?
में मिटा भी दूँ अतीत
पर क्या कभी तुम ना पूछोगे ?..
जो कुछ मुझ पे बीती है ..
तुम क्या ही समझोगे ?
मैं गिर गिर के सम्हला हूँ ..
किस तरह राहें सजा दूँ ?
जिस लिए खामोश हुआ था
वो राज़ कैसे बता दूँ ?
मैं जिस मंजिल को बढ़ रहा हूँ
क्या तुम साथ चलोगे ?
अगर राहें भटक गयीं
तो क्या फिर से मिलोगे ?
तुम मेरी ज़रूरत हो ..
कैसे ये जता दूँ ?
में डरता नहीं हूँ पर
तुम्हे क्या क्या मैं बता दूँ ?...
नहीं कहता तो संग-ऐ दिल..
जो कह दूँ तो रुसवा हूँ
अजब कशमकश में उलझा हूँ
ये किस मंजिल पे पहुंचा हूँ
अभी हालात नहीं हैं ..
कि जज़्बात बयान हों
कभी फुर्सत मैं तुम मिलो तो ..
ये समंदर भी खला दूँ
तू मेरी हस्ती की वजह है
जो तू नहीं तो मैं नहीं
तुम मुझे हासिल नहीं तो क्या
मैं तो तुमसे जुदा नहीं ...
कोई अफ़सोस तो नहीं है
पर आसां भी नहीं कि
अपनी हकीकत को भुला दूँ
जो सज़ा मेरे लिए लिखी है
वो तुम्हे कैसे सुना दूँ ?
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ज़िन्दगी फिर तेरे वजूद पे यकीन आया
जो खो गया था कहीं मुझसे .. नहीं मिल पाया
मैं अकेला हो गया हूँ ... फिर से उन्ही राहों पे
जहाँ शुरआत हुई थी ... अंत भी वहीँ आया
जो ख्वाब सजाये थे कभी... बिखरे पड़े हैं
मेरे ही कन्धों पे सभी इलज़ाम लदे हैं
मेरी उड़ान पूरी नहीं हुई.... अब तक...
कि मेरे पाँव फिर धरातल पे .. आ लगे हैं
ठोकरें बहुत खायी हैं .. वैसे तो अक्सर ...
पर इस दफा गिरा हूँ ऐसा . कि उठ नहीं पाया ..
ज़िन्दगी फिर तेरे वज़ूद पे यकीन आया ....
कैसे मैं सम्हालूं .. इन फिसलते लम्हों को ?
कैसे सुधारूं ... मैं अपनी गलतियों को ..?
मेरी ज़िन्दगी कि ... कहानी अजब है !
मेरी गुस्ताखियों का .. बस इतना सबब है ..
कि दुश्मन नहीं था.. कभी कोई मेरा ...
मैंने अपने ही हाथों अपना ... आशियाना ..जलाया ....
ज़िन्दगी फिर तेरे वजूद पे यकीन आया ....
जिसकी आरज़ू में करवटें बदलता था रातों ...
छलनी हुआ है वो ... मेरे ही हाथों ...
सुनाऊं मैं कैसे? ये किस्सा नहीं था
जो घायल हुआ.. वो था मेरा मसीहा ...
अपनी लाश पे में ..बहुत रो चुका हूँ
बताऊँ मैं किसको ..कि क्या खो चुका हूँ ...
जिसको लहू से था सींचा .. वो घर मैंने ढहाया
ज़िन्दगी फिर तेरे वजूद पे यकीन आया ....
दुआओं का होता नहीं .. मुझ पर असर कोई
वरना महज़ हाथ उठा के ओरों ने क्या नहीं पाया
कुछ तो कहीं कम था... मेरी ही बंदगी में
जिसे भी खुदा माना ..वो फिर नज़र नहीं आया !!
ज़िन्दगी फिर तेरे वजूद पे यकीन आया ...
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हैं बेसब्र मेरी रातें ...ये दिन बहुत बड़े हैं ...
मैं तो वहीँ खड़ा हूँ ..पर आप चल पड़े हैं ....
एक राह पे चले थे ..मंजिलें जुदा थी अपनी ...
ये वक़्त क्यूँ है ठहरा जो हम बिछड़ गए हैं ...
जो हर शाम गूंजते थे ... वो कहकहे थे अपने
क्यूँ खामोश हो गया मैं ये आप समझते हैं ....
एक वक़्त ऐसा भी था ... कि अपनी भी दास्तान थी ....
अब जो ढूंढा है फिर सहर को ...तो कुछ बिखरे लम्हे मिले हैं .......
लगता है कुछ तो अपनी .. अनबन है ख्वाइशों से
समझा था जिन्हें अपना .. वो औरों को हो चले हैं ....
अभी भी सुलगती हैं ..वो आरज़ू ... वो तमन्नाएं ...
ये कैसी हसरतें हैं ...ये कैसे सिलसिले हैं ....
मैं तो वहीँ खड़ा हूँ ..पर आप चल पड़े हैं ....
एक राह पे चले थे ..मंजिलें जुदा थी अपनी ...
ये वक़्त क्यूँ है ठहरा जो हम बिछड़ गए हैं ...
जो हर शाम गूंजते थे ... वो कहकहे थे अपने
क्यूँ खामोश हो गया मैं ये आप समझते हैं ....
एक वक़्त ऐसा भी था ... कि अपनी भी दास्तान थी ....
अब जो ढूंढा है फिर सहर को ...तो कुछ बिखरे लम्हे मिले हैं .......
लगता है कुछ तो अपनी .. अनबन है ख्वाइशों से
समझा था जिन्हें अपना .. वो औरों को हो चले हैं ....
अभी भी सुलगती हैं ..वो आरज़ू ... वो तमन्नाएं ...
ये कैसी हसरतें हैं ...ये कैसे सिलसिले हैं ....
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सदियों से सदा......... मेरा शोषण हुआ
मन साफ़ था फिर भी.... आँचल मेरा मैला हुआ
मैंने तुम्हारे सम्मान की खातिर... क्या.. ना किया ?
तुम्हे पूजा... और स्वयं... विष अपमान का पीया
ये विषपान करके भी... मैं अनंत हूँ!
मैं स्वतंत्र हूँ !
वो पदमिनी हूँ जिसने... निर्भीक हो जौहर किया
वो जानकी हूँ जिसने... सदा स्वयं को अर्पण किया
में शक्ति हूँ परंतु फिर भी..... मैंने सब सहा
हर मोड़ पे अग्नी परीक्षा दी... पर कुछ भी ना कहा
ऐसी अखंड लौ हूँ जो.. आँधियों में भी ज्वलंत हूँ!
मैं स्वतंत्र हूँ !
मैंने आप खोकर.... तुमको नया आकार दिया
खुद बलिदान हो.... तुम्हारे सपनों को साकार किया
तुम्हारी जीत के पीछे... हमेशा मैं खड़ी थी
हर विषम परिस्तिथी से .. अकेली ही लड़ी थी
तुम नहीं समझे... तुम्हारी विजय का मन्त्र हूँ !
मैं स्वतंत्र हूँ !
मैं जननी भी... मैं पत्नी भी ...सहेली भी ... मैं भगिनी भी
मैं पृथ्वी भी... मैं अग्नी भी...जो तुम चाहो.... मैं सब कुछ हूँ
ना रोको!.. जो मैं बढती हूँ .. तुम्हारे साथ चलती हूँ !
अहम् त्यागो और पहचानो.... मैं तुम्हारा संबल हूँ !
क्रांति की लहर है जो... नारीत्व का वो नवीन अर्थ हूँ !
मैं स्वतंत्र हूँ !
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जिस दिन तुझे मेरी ... ख़ामोशी सुनाई देगी
उस दिन ये दुनिया ... कुछ और ही दिखाई देगी
बेआरजू होके निकला हूँ .. तेरे दर से
हर आहट ... मेरे बिलखते अरमानों की दुहाई देगी
मैं अपने आंसुओं को ... पीता रहूँगा हरदम
पर मेरी मुस्कराहट में ..... उदासी दिखाई देगी
तुने मुझे देखा भी नहीं ...करीब ही था मैं
मेरे टूटे हुए .. दिल की आवाज़ तुझे क्या सुनाई देगी
बहुत दूर चला जा चुका हूँगा मैं.. जबतलक
तेरी रूह.... मेरा नाम पुकारेगी ... सदा देगी !
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खुली हवा सा बहता था... कैसे मैं बंध गया हूँ ?
मैं तो मुसाफिर था ... ये कहाँ ठहर गया हूँ ?
यूँ ही निकलता ...कभी रुकता कभी चलता
हर रोज़ मैं किसी ... नए मौसम से मिलता
कोई डोर नहीं थी ... बाँध लेती जो मुझे
कोई छोर नहीं था ... ना ढूंढूं में जिसे !
ये कैसा अँधेरा है .. जिसे देख थम गया हूँ ...
मैं तो मुसाफिर था ... ये कहाँ ठहर गया हूँ ?
सूरज की नर्म किरणें ... हौले से थपकती थीं
गुज़रती हुई हवाएं ... मेरे गले लगतीं थीं
ओस की बूंदों में ... मेरा अक्स दीखता था
हर राहबर मुझे... अपना कोई लगता था !
ये वक्त की है करवट ... या मैं बदल गया हूँ ?
मैं तो मुसाफिर था ... ये कहाँ ठहर गया हूँ ?
हर शाम ढूंढता था .... कोई नया बसेरा ...
कई हौसले देता था..... मुझको नया सवेरा
हर राह लगती है ... अब अजनबी सी मुझको
जिनसे कभी था मेरा ...सम्बन्ध बहुत गहरा ..
ठोकर लगी है मुझको ?.. या में फिसल गया हूँ ?
मैं तो मुसाफिर था ... ये कहाँ ठहर गया हूँ ?
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