SWATANTRA...SOCH

All religions, arts and sciences are branches of the same tree. All these aspirations are directed toward ennobling man's life, lifting it from the sphere of mere physical existence and leading the individual towards freedom.No one should negotiate their dreams. Dreams must be free to flee and fly high.

  • About This Blog

    This blog contains poems written by me on different topics and with different essence everytime, along with photographs shot by me during various trips in India and UK containing macros, sceneries, urban and rural shots, I hope this blog will serve you with a range of variety and you will enjoy my work.






दोष लोगों का नहीं जो हर वक़्त पे बदलते हैं
ज़ख्म  उनको  भी  हैं.. जो दुनिया  की समझ  रखते हैं। 

 हम खुली आँखों से भी ..  खा गए धोखा।
सलाम उनको है  .. जो बंद आँखों से नज़र रखते हैं। 

ख़ामोशी में भी... वो  आवाज़  ढूंढ़ लाये हैं..
ऐसे बन्दों को ... तो  बादल भी ज़मीन लगते हैं।

वो सितमगर तो नहीं हैं ... पर दोस्ती की क़सम
दो कदम साथ ही माँगा था... मगर वो डरते हैं। 

क्या ही समझेंगे ...  ज़िन्दगी का सबब। ..
जो न तो गिरते हैं ,.. ना सम्हलते हैं।  

ख़ुदा  की भी कुछ खबर .. चलो  ले आएं ज़रा...
सुना है कि वो हर इंसान को परखते हैं .... 

WESTERN GHATS..

Posted by Priyanka Telang On 8:38 AM 0 comments

   
   




















बड़े ही दिन हुए मिले

की बात भी हुई नहीं। .... 
हम तो पूछते, रहे
पर आप ही मिले नहीं ....
जो मिल गए हैं आज तो
क़सर न रह जाए कहीं  …
शब्द तो बहुत हैं
पर आवाज़ ढूंढ  लीजिये। …
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।

कुछ हाल-ऐ-बयान ही करें

कुछ रंग पुराने भरें  ....
अगर है, फिर भी क़श्मक़श
तो खाली ज़ाम ही भरें ....
गुज़रे सालों से पूछिये ज़रा
छूटे हैं वो हसीं लम्हे कहाँ? …
थे जिस पे, आखिरी निशान 
वो क़िताब,  ढूंढ लीजिये ....
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।

वो आरज़ू , वो हौसले

वो दूर होते,  फ़ासले  ....
वो शाम की रुबाइयाँ
वो मनचली पुरवाइयां  ....
अभी भी गूंजते हैं जो
वो गीत वो शहनाइयां।  …
आलम तो बन ही जाएगा
बस अंदाज़ ढूंढ लीजिये  ……
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।

अभी भी वक़्त है हुज़ूर

हालात को करिए  क़ुबूल  ....
इन हसरतों की ग़ुलामी
से भी बड़ी है ज़िंदगानी  ....
यूँ आसमां की होड़ में
ज़मीन को ना छोड़िये  ....
ख़ुश रहे जो,  हर हाल में
वो मिज़ाज़ ढूंढ लीजिये  …
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।

ये ज़िन्दगी की शाम है  …

अब आपको क्या काम है?
हमने तो चुन लिया है घर …
आपका क्या  इंतज़ाम  है ?
चले थे जिनको छोड़ कर
फिर मिल गए इस मोड़ पर  …
एहसास की कमी नहीं
ज़ज़्बात ढूंढ लीजिये  …
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।




वो पूछते हैं , अरे मुसाफिर चला कहाँ को?
क्या तेरी मंज़िल का पता तुझे है?....
कह दिया उनको,.... मैंने मुस्कुरा के.…
जहाँ पे मिलेगा …  ये सूरज ज़मीं से
है बस मुझे भी ,… जाना वहीँ पे …

हर दिन मैं मंज़िल , … नयी ढूंढता हूँ

अब मेरा मज़हब आवारगी है।

कभी मैं गुज़रता हूँ जंगलों से। …

कभी मैं निकलता हूँ पर्वतों से.…
नदी , झरने , राहें … हैं मेरे साथी
हर मुश्किल मुझे , नया  सबक सिखाती। …
सभी बंदिशों से ,  मैं बेखबर हूँ
आवारा परिंदों का ,  मैं हमसफ़र हूँ। .......

नहीं मेरा नाता मस्जिद , मंदिरो से.…
बस मेरा मज़हब आवारगी है !

सफर मैं मज़ा.. जब से आने लगा है

मेरा डर कहीं तो , ठिकाने लगा है.……
समेटा है जब से.. अपने हौसलों को
हर दर्द मुझसे खौफ खाने लगा है। ....
मजबूरियों  से जब...बढ़ा ली है दूरी। ....
अब जो भी कमी है...मैं कर लूँगा पूरी।

मेरी   आज़ादी  ही...  मेरी बंदगी है
हाँ मेरा मज़हब आवारगी है.…




TURKEY...The land of Ottoman Empire

Posted by Priyanka Telang On 3:46 PM 0 comments









बहुत मुश्किल है.....

Posted by Priyanka Telang On 1:38 PM 0 comments



बहुत मुश्किल है मोहब्बत में.……
कभी जीना कभी मरना। ....
बड़ी शिददत से देखना तुझे ....
फ़िर एक आह भर लेना।

तेरा वो जान बूझ कर …
मुझे नज़रअंदाज़  कर  देना।
और मेरे दिल मैं सवालों के  …
कई सैलाब उमड़ना।

तेरा.. मेरे बारे मैं सोच कर ....
वक़्त ... ज़ाया नहीं करना
और मेरा... कोई भी लम्हा  …
तेरे बगैर.. ज़ाया नहीं होना।

वो तरस खा कर... कभी मेरी हालत पर …
तेरा अफ़सोस... कर लेना ।
वो हर बदलाव पर... तेरे  …।
मेरा... चुपके से रो लेना।

बिना दुशवारियों के..  वो तेरा
मुझसे बढ़ा लेना फासले  ....
मेरा... भुलाने  की कश्मकश में भी …
तुझ ही को याद कर लेना।

शब्-ए -फ़रहत  बिताना तेरा …
 किन्हीं और बाँहों में
और मेरा रात भर एकटक ...
खाली... दीवार को तकना

बड़ा मुश्किल है मोहब्बत में ...
कभी जीना कभी मरना।
वो तेरा बच के निकल लेना ....
मेरा बर्बाद हो जाना।



शब्-ए -फ़रहत - nights of pleasure




फिर से वक़्त ने करवट ली है … 
फिर मेरे दिल का हाल वही है …… 
मेरे हौसलों पे... तो मुझको यकीं हैं 
पर क्या खो गया है?.…ये किस की कमी है ?
क्या साथी कोई छूट गया है ?
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


हुआ कोई यूँ बिन इजाज़त के दाखिल। ….  
जो मुमकिन नहीं था.….  वो कर गया हासिल 
हिजाक़त पे मेरी … परदे गिरा के …
खुली आँखों से मुझको …  सपने दिखा के 
कोई अरमानों को लूट गया है। 
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


सफ़र कट रहा था तन्हाई मैं भी.… 
उस राही ने क्यूँ? …  मुझको आवाज़ दे दी। 
सूने पड़े दिल मैं मेरे  …. हलचल मचा के 
मेरे ज़हन मैं अपनी … यादें बसा के 
वो लगता है.… सब भूल गया है। 
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


राह-ऐ-दहर पे.…  मैं बढ़ तो गया हूँ। 
कोई... मंजिल नहीं है, जहाँ को चला हूँ। 
मैंने दर्द-ऐ-ग़म से, भर के … वक़्त खाली
अपनी बेगानों में भी... जगह बना ली। 
पर अपना कोई रूठ गया है 
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


ना मैंने शिकायत की ... रब से कोई 
पर सांसों में अब भी... क्यूँ बसता है वो ही?
काबू में कर के.... अपनी हसरतों को ...
मैंने हंसी... से.... सजाया, लबों को...
पर आँखों से सब फूट गया है ...
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


हिजाक़त  - wisdom






ज़िन्दगी तुझसे कई उम्मीदें लगा बैठे हैं।
क्या कहें ख्वाहिशें क्या दिल में सजा बैठे हैं।


 ग़म से तोड़ दिए हमने.............. पुराने रिश्ते

बेपरवाह होके........... नए रिश्ते बना बैठे हैं।


शोर न समझो... मेरी सांसों के बदलते सरगम को

ये साज़ हम.............. बरसों से दबा बैठे हैं।


क्या मिला है किसी को.… साहिल पे खड़े होकर

हम तो लहरों पे....... नयी राहें बना बैठे हैं।


ये वक़्त भी देखना बाकी था..... ऐ हमदम

की अफसाना-ऐ-हस्ती का मेरी.... लोग किस्सा बना बैठे हैं।


लुत्फ़-ऐ-हयात तो... गर्दिश मैं ही समझ आता है

गुज़र जायेंगे हर मुश्किल से... ये शर्त लगा बैठे हैं।


ज़रा बहती हुई हवा का रुख पहचानो।

इसमें कुछ लोग... हर चीज़ गँवा बैठे हैं।


ज़िन्दगी चुरा ले गयी......  वक़्त मेरे हाथों से

अब आखिरी दाव ज़िन्दगी का.... लगा बैठे हैं।





SWARTHNEETI – Substance of Narcissism

Posted by Priyanka Telang On 6:21 AM 1 comments





Raajneeti a very popular term in Indian context, being nurtured in Indian Blood from ages in to elite and the suppressed class, as a synonym of ' Patriotism' in early India, governed by moral values, principles and ethical conduct, with no particular organization or institute enforcing or regulating but self regulated and established by self discipline.
India a celebrated symbol of civilization is heading towards a global domination but diminishing altruism. With respect to contemporary India which emanates as an extreme malevolence is not derived or governed by Rajneeti(The Politics for National Welfare) but a more apt term to adduce would be Swarthneeti

India a a nation once known to be distinctly blessed and glorious, is under the spell of perilous curses yielded by its own soil. The ironic 180 degree turn in India's social, political and Economic outlook resulting from cultural chaos, religious prejudices and factors governed by premature globalization and misunderstood modernism are mere starters in a 3 course meal.

Menace of Social Lethal Weapons
It is purely reduced to Individual aspirations of democratic leaders elected by us. These so called public servants in the rush to chase power and associated immense wealth, don't hesitate stepping on dead bodies of social values, morality, and above all humanity . While the solution part is gloomy, we are sinking in a pool of problems which has emerged due to intentional negligence of governance and almost 'NO RULES to be FOLLOWED' society of many cold-blooded lethal weapons mistakenly called or assumed Humans.

These deadly weapons are walking loose in the society almost everywhere we live, walk, get educated or work. We are surrounded by them, ignorant about when we will become the target of their violence . They are fearless because they know that even if they do some barbarism to destroy the peace and harmony of Society, they will soon get social acceptance and will be forgiven, because we are peace loving people we
have no time from our busy schedules to waste on cleansing the society full of these sinister demons. The softness that we have acquired is actually getting hard on us.

The hypocritical Society
on the other hand the victims and their families are constantly victimized by our contemptible statements and constant surveillance on their move, some of us never leave an opportunity to pass hurting jibes and comment on their possible fault that could have invited the crime. I am specially talking about those self acclaimed
public personalities or religious gurus who are not even sensitive enough to refrain themselves to comment during such volatile situations, proving their irresponsibility and hypocrisy.

SWARTHNEETI - Influence and expansion
has acquired every sphere of our life be it personal or professional. 'We are not people of substance' as we used to be rather we are 'substance of narcissism'. The humanity that was endowed as a crucial ingredient in
us is vanishing.

The human values, the 'society First' 'serve the mankind' attitude are extinct. And the immediate hope 'The rule of LAW' is reduced to theory. So the only savior could possibly be a social and cultural revolution lead by youth and some genuine humanity seekers. But whatever bad or worst we have evolved into some basic rules can't be manipulated, i.e. 'Freedom exercised without discipline is menace' and 'Individual
benefits can never be enjoyed forever if society is suffering'.

The Happiness that we are chasing is good only when shared. This is high time to awaken the dead soul in our living body and be responsible and participate for a change, to give our upcoming generation a sense of pride and feeling of safety that every human in a civilized society deserves. We need this change not for others but for our own mankind. The first transformation should be initiated from within, It's on us to
decide who is important I, ME, MYSELF or US?.

And while making this decision we must not forget whatever goes around comes back, if you are ignoring because you are not affected or Victim of any such heinous crime, pray and be thankful that you are lucky enough it's just a matter of time, because when fire spreads no one is spared.



तेरी आँखों के चमकते मोती !
मुझे फिर एक बार डुबाने  चले हैं ...

क्या ये जानते नहीं मेरी हालत?
जो मुझे फिर से आज़माने चले हैं ..

बड़ी ही कशमकश में दिल है ...कैसे बहले ?
की वो हम पे दिल-ओ-जान लुटाने चले हैं। ...

ग़ज़ब ये इत्तेफाक़ है की तुझे याद भी आये हम ..तब
जब खुद को ... तेरी नज़रों से छुपाने चले हैं  ...

ये खुशबू जो तुम्हे अब बेक़रार करती है।
वो जूनून है .... जिसपे परवाने जले हैं ....

तू जिसकी जुस्तुजू  में .... बस कुछ ही पलों से है ..
हम उसे ... त़ाउम्र सम्हाले चले हैं ...

बड़ा हसीन शौक है ..मुहब्बत  मेरे हुज़ूर ...
कई सालों  से ... इस सफ़र पे ज़माने चले हैं ...

जो पहल कर ही दी है तुमने ... तो बस इतना समझ लो!
बड़े बर्बाद हुए हैं ...जो भी निभाने  चले हैं !

बहुत आजाब  है ...ग़म-ऐ-फुरक़त  से उबरना
कई मुददतों ...  से हम भी भुलाने चले हैं !

कल क्या होना है ...क्या नहीं होगा ?
वो क्या सोचेंगे ..जो खुद तक़दीर  बनाने चले हैं !